बहुत दिनों बाद एक भोजपूरी फ़िल्म देखने का मौका मिला... आम तौर पर भोजपूरी फ़िल्में मैं नहीं देखता ... उसकी सबसे बडी वजह है.... भोजपूरी फ़िल्मों का मेरी उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाना.... जब भोजपूरी फ़िल्मों की फ़िर से हवा चली थी ...तो मुझे लगा था कि भोजपूरी फ़िल्में दर्शकों की उस भूख को मिटा पाने मे सफ़ल होगी ...जिसके कारण दर्शक उसके करीब आये.... भोजपूरी के करीब दर्शकों के आने का सबसे बड़ा कारण मेरे अनुसार ... हिन्दी फ़िल्मों से हिन्दुस्तान का गायब होना था... हिन्दी फ़िल्में हमारे देश के रियल इमोशन से दूर चली गई थी... और एक ऐसी दुनिया का निर्माण करने लगी थी...जहां हिन्दुस्तान का काम आदमी अपने आप को फ़िट नहीं कर पा रहा था...! मगर भोजपूरी फ़िल्मों ने उन दर्शकों के साथ क्या किया... उम्मीद से देख रहे उन दर्शकों के सामने हिन्दी फ़िल्मों की घटिया संस्करण प्रस्तुत किये.... जिसकी न मेकिंग अच्छी थी ...न एक्टिंग...और ना ही कहानी... यहां आकर भी दर्शक ठगा सा महसूस करने लगा...खैर...! मगर ये फ़िल्म “सईंया ड्रायवर बीबी खलासी” उन फ़िल्मों से हट कर है.... किसी फ़िल्म को देखने लायक अगर कोई चीज ...
मैं और तुम मैं अक्सर सोचता हूं तेरे –मेरे संबंधों के बीच सिर्फ़ रोजमर्रे की ज़रूरतें हैं या कुछ और...? कम होती चाय की मिठास बेस्वाद होती सब्जियां मंहगे होते रसोई गैस हैं या कुछ और...? मुझे इंतजार है उस दिन का जब मैं घर लौटूं तुम सवाल बन तीर की तरह सीने में नहीं चूभो बल्कि खुश्बू बन सांसों में समा जाओ.... राह तक रहा हूं उस पल की जब कम होती चाय की मिठास तेरे प्यार से पूरी हो जाये...! मैं जानता हूं तुम जैसी हो...बन गई हो उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं.. ये तो कोई और है जो अलग कर रहा है...तेरी-मेरी सांसों से खुश्बुओं को.... हमारी आंखों से चुरा रहा है सपने उस नशे को जो सुरुर बन छाता रहा है हमारे तन–मन पर... हम जानते हैं कौन चूरा रहा है हमारे जीवन से संगीत कौन कर रहा है कसैला हमारा स्वाद...? कौन बनाकर कठपुतली नाचा रहा अपने इशारे पर... कौन दूर कर रहा हमें हमारी विशालता हमारी विराटता से... बना रहा लघु से लघुतर हमारे पहाड़ों को कौन रहा तोड़ जंगलों को कौन रहा काट ... उस शत्रु की गंध पहचान सकता हूं मैं... अब लड़ना ही होगा...
pagdandiyan: तीन बहनें : "वे खिल-खिल, खिल-खिल हंसती हैं हंसी उनकी हवा में घुल-घुल,घुल-घुल जाती है वे हंसती हैं और बस हंसती चली जाती हैं एक निश्चाल, नि:स्वार्थ और उनमु..."
मैं अपनी खिड़की से झाँक रहा था... बाहर अपने बरामदे में खड़ी थी तू.... न चाँद थी और नहीं कोई परी थी तू... सीधी-सादी साधारण सी एक लड़की थी तू.... मन में असंख्य तरंगें छुपाये जैसे मैं तुम्हें देख रहा था... अनगिनत लहरों में डूबती-उतराती वैसे ही खड़ी थी तू... मैं तुम्हे देर तक देखता रहा इस एहसास की लाली तुम्हारे गालों पर साफ देखी जा सकती थी... मेरे देखे जाने तक तू वैसे ही खाड़ी रही... मैं चाहता था...तुम्हारे करीब आना तुम्हे छूना खूब सारी बातें करना मगर एक अनजाना डर रोक रहा था मुझे भी तुझे भी...