काहे को ब्याहे बिदेस काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस भैया को दियो बाबुल महले दो-महले हमको दियो परदेसअरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ जित हाँके हँक जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेसहम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँघर-घर माँगे हैं जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसकोठे तले से पलकिया जो निकलीबीरन में छाए पछाड़अरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसहम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँभोर भये उड़ जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसतारों भरी मैनें गुड़िया जो छोडी़छूटा सहेली का साथअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसडोली का पर्दा उठा के जो देखाआया पिया का देसअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसअरे, लखिय बाबुल मोरे -अमिर खुसरो हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद जिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रातउन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डो...
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जीवन क्या है
जीवन क्या है ? ये सवाल अक्सर मेरे मन में उठता रहता है ..आज भी एक बार सामने खड़ा हो गया है !...जिसका उत्तर मुझे कार्ल मार्क्स के एक वाक्य में मिल गया है ...मार्क्स ने लिखा है - जीवन एक संघर्ष है !..ये वाक्य बहुत पहले ही मैंने पढ़ा है ..मगर मतलब बहुत दिनों बाद समझ पाया हूँ..सच ही तोह कहा मार्क्स ने ...जीवन संघर्ष ही तो है -जीवन और मृत्यु के बीच का संघर्ष , सच और झूठ का संघर्ष , ज्ञान और अज्ञानता का संघर्ष , विज्ञान और अन्धविश्वास का संघर्ष ,प्यार और घृणा का संघर्ष , अमीरी और गरीबी का संघर्ष ..सफलता और असफलता का संघर्ष ..........
भोजपूरी फ़िल्मों के लिये नई ज़मीन की तलाश करती “ सईंया डराईवर बीवी खलासी”
बहुत दिनों बाद एक भोजपूरी फ़िल्म देखने का मौका मिला... आम तौर पर भोजपूरी फ़िल्में मैं नहीं देखता ... उसकी सबसे बडी वजह है.... भोजपूरी फ़िल्मों का मेरी उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाना.... जब भोजपूरी फ़िल्मों की फ़िर से हवा चली थी ...तो मुझे लगा था कि भोजपूरी फ़िल्में दर्शकों की उस भूख को मिटा पाने मे सफ़ल होगी ...जिसके कारण दर्शक उसके करीब आये.... भोजपूरी के करीब दर्शकों के आने का सबसे बड़ा कारण मेरे अनुसार ... हिन्दी फ़िल्मों से हिन्दुस्तान का गायब होना था... हिन्दी फ़िल्में हमारे देश के रियल इमोशन से दूर चली गई थी... और एक ऐसी दुनिया का निर्माण करने लगी थी...जहां हिन्दुस्तान का काम आदमी अपने आप को फ़िट नहीं कर पा रहा था...! मगर भोजपूरी फ़िल्मों ने उन दर्शकों के साथ क्या किया... उम्मीद से देख रहे उन दर्शकों के सामने हिन्दी फ़िल्मों की घटिया संस्करण प्रस्तुत किये.... जिसकी न मेकिंग अच्छी थी ...न एक्टिंग...और ना ही कहानी... यहां आकर भी दर्शक ठगा सा महसूस करने लगा...खैर...! मगर ये फ़िल्म “सईंया ड्रायवर बीबी खलासी” उन फ़िल्मों से हट कर है.... किसी फ़िल्म को देखने लायक अगर कोई चीज ...
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