pagdandiyan: तीन बहनें: "वे खिल-खिल, खिल-खिल हंसती हैं हंसी उनकी हवा में घुल-घुल,घुल-घुल जाती है वे हंसती हैं और बस हंसती चली जाती हैं एक निश्चाल, नि:स्वार्थ और उनमु..."
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काहे को ब्याहे बिदेस काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस भैया को दियो बाबुल महले दो-महले हमको दियो परदेसअरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ जित हाँके हँक जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेसहम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँघर-घर माँगे हैं जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसकोठे तले से पलकिया जो निकलीबीरन में छाए पछाड़अरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसहम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँभोर भये उड़ जैहेंअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसतारों भरी मैनें गुड़िया जो छोडी़छूटा सहेली का साथअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसडोली का पर्दा उठा के जो देखाआया पिया का देसअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसअरे, लखिय बाबुल मोरेकाहे को ब्याहे बिदेसअरे, लखिय बाबुल मोरे -अमिर खुसरो हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद जिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रातउन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डो...
तन थिरकते हैं पर मन नहीं इंसान जन्म के साथ ही संगीत अपने साथ लाता है, ताउम्र उसी में जीता है, जीने की प्रकिया में उसका विस्तार करता है ! अपने सुख, अपने दुख, अपने हर्ष, अपने उल्लास को सुर–ताल में बांधना है, और पूरे सामाज के साथ मिलकर गाता है...! और एक ऐसे महौल की रचना करता है जो जीने लायक होता है...! वही माहौल उस समाज की पहचान बन जाता है..! संगीत इंसान के मन का उदगार है... जो कभी दुख तो कभी सुख में व्यक्त होता है...! इंसान जिन परिस्थितियों में जीता है, उन्हीं से गीत-संगीत पैदा करता है...! भोजपूरी के गीत-संगीत भी इनसे अलग नहीं हैं...! भोजपूरी के गीतों में पलायन हमेशा से केन्द्र में रहा है क्योंकि इस समाज के अधिकतर मर्द कमाने के लिये घर- परिवार छोड़कर परदेस जाते रहे हैं ! भिखारी ठाकुर और महेन्द्र मिश्र के गीतों में इस दर्द को साफ़ तौर पर महसूस किया जा सकता है - सुतले में रहली ननदो , देखली सपनवा, कलकतवा से मोर बलमु अईलन हो राम.../ आई दिन मघवा कपावे लागी मघवा, हड़वा में जड़वा समाई हो विदेसिया...! भोलानाथ गहमरी का एक बिरह गीत है – कौने खोतवा लुकईलु ,आहिरे बालम चिरई ...! इन गीतों में क...
वे खिल-खिल, खिल-खिल हंसती हैं हंसी उनकी हवा में घुल-घुल,घुल-घुल जाती है वे हंसती हैं और बस हंसती चली जाती हैं एक निश्चाल, नि:स्वार्थ और उनमुक्त हंसी वे हंसती हैं साथ –साथ उनके हंसता है पूरा आलम उनकी हंसी चिड़ियों तक पहुंचती है... और वे गाने लगती हैं ... फूल सुनते हैं और खिलने लगते हैं .. उनकी हंसी नदि को छूती है और तरंगें उठने लगती हैं पास वाले बगीचे में उसकी हंसी जाती है और अमरूद में मीठास घोल आती है.... सबेरे का सूरज रास्ते में उनकी हंसी सुनता है और उसके गालों पर लाली छा जाती है... वे नहीं जानतीं हर रात चान्द उनकी हंसी सुनने ही उनके छत पर आता है और अनगिनत तारे दूर से ही टीम-टीम,टीम-टीम करते हैं ...
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